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शारदीय नवरात्रि

शारदीय नवरात्रि 2026: महत्व, तिथियाँ और घटस्थापना मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि 2026 की तिथियाँ, घटस्थापना मुहूर्त, महत्व और पूजा मार्गदर्शन।

शारदीय नवरात्रि 2026: महत्व, तिथियाँ और घटस्थापना मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि 2026: महत्व, तिथियाँ और घटस्थापना मुहूर्त

 

जैसे ही शरद ऋतु का आगमन होता है, वातावरण में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार होने लगता है। इसी के साथ भारत के सबसे प्रिय त्योहारों में से एक नवरात्रि का शुभारंभ होता है। नौ रात्रियों तक शहरों और कस्बों में स्वर्णिम सजावट की रौनक छा जाती है। भव्य पूजा पंडालों में माँ दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं। सुबह की शुरुआत देवी माँ के भक्तिमय भजनों से होती है। संध्या आरती में वातावरण भक्तिमय हो उठता है और रात ढलते-ढलते गरबा की ताल पर थिरकते कदम नवरात्रि की रौनक को और बढ़ा देते हैं।

कहीं उत्सव के व्यंजनों की मनमोहक सुगंध वातावरण को महका देती है, तो कहीं ढोल की गूँज और साथ मिलकर उत्सव मनाने का आनंद हर किसी के मन में उमंग भर देता है। नवरात्रि अपने साथ अपनापन, उत्साह और उल्लास की एक विशेष अनुभूति लेकर आती है।

इस अद्भुत पर्व, इसकी समृद्ध परंपरा और इसे मनाने के विविध तरीकों के बारे में जानने के लिए आगे पढ़ें। 

मुख्य बातें:

शारदीय नवरात्रि क्या है? 

शारदीय नवरात्रि, जिसे शरद नवरात्रि, आश्विन नवरात्रि या महानवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है, देवी दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है, को समर्पित नौ रातों और दस दिनों का पर्व है। यह हिंदू चंद्र कैलेंडर के आश्विन मास (सितंबर–अक्टूबर) के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इसका आरंभ प्रतिपदा (पहली तिथि) से होता है और नवमी (नौवीं तिथि) तक चलता है। इसके बाद दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है।

आश्विन नवरात्रि देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय का स्मरण कराती है और यह अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। 

हम चार नवरात्रि क्यों मनाते हैं?

नवरात्रि हर वर्ष ऋतु परिवर्तन के प्रमुख समय पर आती हैं। यह नौ दिनों का पर्व आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सनातन परंपरा में ऋतु परिवर्तन के इन चरणों को संधिकाल कहा जाता है। यह वह समय होता है जब मौसम परिवर्तन के साथ प्रकृति का स्वरूप भी बदलता है। 

ऋतु परिवर्तन का प्रभाव हमारे शरीर की पाचन प्रक्रिया और रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर भी होता है। नवरात्रि के दौरान रखा जाने वाला पारंपरिक व्रत और शुद्ध, सात्त्विक आहार शरीर को हल्का रखने तथा बदलते मौसम के अनुरूप स्वयं को तैयार करने में सहायक माना जाता है।

शारदीय नवरात्रि और अन्य नवरात्रियों में क्या अंतर है?

वर्ष में मनाई जाने वाली चार नवरात्रियों में शारदीय नवरात्रि सबसे अधिक लोकप्रिय और व्यापक रूप से मनाई जाती है। इन चार नवरात्रियों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—प्रकट और गुप्त।

शारदीय और चैत्र नवरात्रि प्रकट नवरात्रि हैं, जबकि आषाढ़ और माघ नवरात्रि गुप्त नवरात्रि मानी जाती हैं। प्रकट नवरात्रियों का आयोजन और पालन अधिक व्यापक स्तर पर किया जाता है।

  • शारदीय महा नवरात्रि शरद ऋतु के आगमन का संकेत देती है। इस दौरान देशभर में भव्य डांडिया-रास, दुर्गा पूजा और रामलीला का आयोजन किया जाता है।
  • माघ गुप्त नवरात्रि जनवरी–फरवरी में मध्य शीत ऋतु से शीत ऋतु के अंतिम चरण की ओर होने वाले परिवर्तन का समय है। इसे मातंगी नवरात्रि या राज श्यामला नवरात्रि के रूप में भी मनाया जाता है।
  • चैत्र नवरात्रि, जिसे वसंत नवरात्रि भी कहा जाता है, शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु की ओर होने वाले परिवर्तन का समय है, जो मार्च–अप्रैल में आता है। इसी पर्व की पहली तिथि से हिंदू नववर्ष का आरंभ होता है और इसका समापन श्री राम नवमी के साथ होता है।
  • आषाढ़ गुप्त नवरात्रि ग्रीष्म ऋतु से वर्षा ऋतु की ओर होने वाले परिवर्तन का समय है, जो जून–जुलाई में आता है। इसे वाराही नवरात्रि के रूप में भी मनाया जाता है।

शारदीय नवरात्रि 2026 : तिथि और मुहूर्त

आरंभ तिथि : रविवार, 11 अक्टूबर 2026
समापन तिथि : सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 

पंचांग के अनुसार, प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात 9:19 बजे से प्रारंभ हो रही है। हालांकि, पारंपरिक उदय तिथि (सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि) के अनुसार, नवरात्रि का पहला दिन 11 अक्टूबर को मनाया जाएगा। 

दिवस 

दिनांक 

देवी / पूजा 

दिन 1 

11 अक्टूबर ( रविवार ) 

घटस्थापना, माँ शैलपुत्री पूजा 

दिन 2

12 अक्टूबर ( सोमवार )

माँ ब्रह्मचारिणी पूजा 

दिन 3

13 अक्टूबर ( मंगलवार ) 

माँ चंद्रघंटा पूजा 

दिन 4 

14 अक्टूबर ( बुधवार ) 

माँ कूष्मांडा पूजा 

दिन 5 

15 अक्टूबर ( गुरुवार) 

माँ स्कंदमाता पूजा 

दिन 6

16 शुक्रवार ( शुक्रवार) 

माँ कात्यायनी पूजा 

दिन 7

17 अक्टूबर ( शनिवार ) 

माँ कालरात्रि पूजा 

दिन 8

18 अक्टूबर ( रविवार ) 

महागौरी पूजा ( सरस्वती पूजा ) 

दिन 9

19 अक्टूबर ( सोमवार ) 

दुर्गा अष्टमी, महा नवमी, कन्या पूजन 

दिन 10 

20 अक्टूबर (मंगलवार ) 

दुर्गा विसर्जन, विजयादशमी, (दशहरा) 

2026 में घटस्थापना (कलश स्थापना) का मुहूर्त क्या है?  

2026 में घटस्थापना (कलश स्थापना) का मुहूर्त क्या है?

घटस्थापना नौ दिवसीय नवरात्रि पर्व के औपचारिक आरंभ का प्रतीक है। इसके माध्यम से देवी शक्ति का आवाहन किया जाता है। मान्यता है कि इन नौ दिनों के दौरान स्थापित घट में परम शक्ति का वास रहता है।

घटस्थापना अमावस्या, राहुकाल या रात्रि में नहीं की जाती। भक्त कलश के पास अखंड ज्योत प्रज्वलित करते हैं, जिसे नवरात्रि की नौ रातों और दिनों तक लगातार जलाए रखने की परंपरा है।

शास्त्रों के अनुसार, घटस्थापना प्रतिपदा तिथि के रहते हुए दिन के प्रथम एक-तिहाई भाग में की जानी चाहिए।

घटस्थापना में तीन मुख्य घटक होते हैं:  

  • जवारे : मिट्टी से भरे एक उथले पात्र में सप्त धान्य (सात प्रकार के अनाज) बोए जाते हैं। नौ दिनों के अंत तक ये अनाज हरे-भरे अंकुरों में बदल जाते हैं, जो समृद्धि, विकास और प्रचुरता का प्रतीक माने जाते हैं।
  • कलश : पीतल, तांबे या मिट्टी के कलश में पवित्र जल, सिक्के, सुपारी और पवित्र पत्तियाँ, सामान्यतः आम या अशोक के पत्ते, रखे जाते हैं। कलश के कंठ पर पवित्र लाल धागा (मौली) बाँधा जाता है।
  • नारियल : लाल वस्त्र में लिपटा या पवित्र धागे से बँधा हुआ नारियल कलश के ऊपर इस प्रकार रखा जाता है कि उसका मुख ऊपर की ओर रहे। यह पूरी स्थापना देवी के ब्रह्मांडीय स्वरूप का प्रतीक मानी जाती है।

2026 में घटस्थापना का मुहूर्त चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के दौरान पड़ रहा है, जिन्हें पारंपरिक रूप से शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है। चूँकि इनका प्रभाव पूरे दिन रहने वाला है, इसलिए 11 अक्टूबर को निर्धारित प्रातःकालीन मुहूर्त या अभिजीत मुहूर्त में घटस्थापना करने की सलाह दी जाती है।

  • प्रतिपदा तिथि प्रारंभ — 10 अक्टूबर 2026, सुबह 11:49 बजे
  • प्रतिपदा तिथि समाप्त — 11 अक्टूबर 2026, दोपहर 12:00 बजे
  • चित्रा नक्षत्र प्रारंभ — 10 अक्टूबर 2026, दोपहर 12:12 बजे
  • चित्रा नक्षत्र समाप्त — 11 अक्टूबर 2026, दोपहर 1:02 बजे
  • वैधृति योग प्रारंभ — 10 अक्टूबर 2026, दोपहर 12:32 बजे
  • वैधृति योग समाप्त — 11 अक्टूबर 2026, सुबह 11:35 बजे
  • घटस्थापना मुहूर्त — सुबह 7:14 बजे से 11:01 बजे तक
    अवधि — 3 घंटे 47 मिनट
  • घटस्थापना अभिजीत मुहूर्त — दोपहर 12:32 बजे से 1:17 बजे तक
    अवधि — 45 मिनट

क्या शारदीय नवरात्रि भारत के बाहर या नौकरीपेशा लोग भी मना सकते हैं? 

हाँ, आप दुनिया में कहीं भी हों, नवरात्रि को अपनी व्यस्त दिनचर्या के साथ सहज रूप से मनाया जा सकता है। सनातन परंपरा में बाहरी नियमों की कठोरता से अधिक भाव और भक्ति को महत्व दिया गया है।

  1. भारत से बाहर रहने वाले लोग स्थानीय सूर्योदय और मुहूर्त के अनुसार घटस्थापना और दैनिक पूजा कर सकते हैं। इसके लिए भारतीय समय के अनुसार समय बदलना आवश्यक नहीं है।
  2. आसानी से उपलब्ध सात्त्विक आहार जैसे ताजे फल, दूध, दही, मेवे, आलू और साबूदाना का सेवन कर सकते हैं।
  3. फलाहार का विकल्प अपनाया जा सकता है। दिनभर काम के दौरान फल या मेवे लें और शाम को एक सात्त्विक भोजन कर सकते हैं।
  4. यदि पूरे नौ दिनों तक व्रत रखना संभव न हो, तो पहले दिन और अष्टमी/नवमी जैसे चुनिंदा दिनों में व्रत रखा जा सकता है। अन्य दिनों में सात्त्विक और शाकाहारी भोजन लिया जा सकता है।
  5. व्यस्त दिनचर्या में सरल पूजा-पद्धति अपनाएँ। दीपक या धूप जलाएँ, देवी को फूल या फल अर्पित करें और मंत्रों का जाप करें। शाम को दुर्गा आरती भी सुनी जा सकती है।

यदि आहार संबंधी व्रत से काम प्रभावित होता है, तो नौ दिनों के लिए किसी एक आदत का त्याग भी व्रत के रूप में किया जा सकता है, जैसे सोशल मीडिया का अधिक उपयोग, कॉफी, धूम्रपान या नकारात्मक वाणी।

आप साधना ऐप में 11 से 20 अक्टूबर 2026 तक “सिंह” आइकन पर क्लिक करके सरल और प्रभावी नवदुर्गा साधना भी कर सकते हैं। इसके लिए किसी बाहरी सामग्री की आवश्यकता नहीं है—आवश्यक है केवल देवी के प्रति श्रद्धा और प्रेम।

कन्या पूजन (कंजक) कब किया जाता है? 

कन्या पूजन (कंजक या कुमारी पूजा) नवरात्रि के अष्टमी (आठवें दिन) या नवमी (नौवें दिन) को किया जाता है। इस पूजा में छोटी कन्याओं को देवी दुर्गा के साक्षात, जीवंत स्वरूप के रूप में सम्मानित किया जाता है। मान्यता है कि नवरात्रि का व्रत देवी के मानवीय स्वरूप की पूजा और सम्मान के बिना पूर्ण नहीं होता।

इसलिए कन्याओं को भोजन कराकर, उनकी पूजा करके और उन्हें उपहार देकर भक्त नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की प्रतीकात्मक रूप से पूजा करते हैं। सामान्यतः 9 कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार 1, 3, 5 या 7 कन्याओं का भी पूजन किया जा सकता है।

कन्या पूजन (कंजक) कैसे करना चाहिए? 

कन्या पूजन की पारंपरिक विधि इस प्रकार है:

  1. चरण प्रक्षालन : भक्त सबसे पहले छोटी कन्याओं के चरण धोते हैं। यह विनम्रता, सम्मान और स्वागत का भाव दर्शाता है।
  2. तिलक और मौली : कन्याओं के माथे पर लाल कुमकुम या सिंदूर का तिलक लगाया जाता है, साथ में अक्षत अर्पित किए जाते हैं और उनकी कलाई पर पवित्र लाल मौली बाँधी जाती है।
  3. सात्त्विक भोजन : कन्याओं को पारंपरिक सात्त्विक भोजन कराया जाता है, जिसमें सामान्यतः सूजी का हलवा, पूरी और काले चने शामिल होते हैं।
  4. उपहार अर्पित करना : भक्त अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता के भाव से कन्याओं को छोटे-छोटे उपहार, जैसे स्टेशनरी, लाल चुनरी, चूड़ियाँ या दक्षिणा अर्पित करते हैं।
  5. चरण स्पर्श : अंत में भक्त कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

जैसे ही यह पर्व हमारे घरों को आनंद, संगीत और प्रकाश से भर देता है, माँ दुर्गा आप और आपके प्रियजनों को स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद प्रदान करें। 

नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!