श्रावणे शुक्लपक्षे तु पुत्रदा नाम विश्रुता।
एकादशी वाञ्छितदा कुरुध्वं तद्व्रतं जनाः॥
(पद्म पुराण, उत्तर खण्ड, 55.32)
अर्थ - हे मनुष्य! श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका व्रत अवश्य करें। यह 'पुत्रदा एकादशी' के नाम से प्रसिद्ध है, श्रद्धापूर्वक किया गया यह व्रत आपकी हर मनोकामना पूर्ण करता है।
श्रीकृष्ण द्वारा कही गई यह सनातन वाणी श्रावण पुत्रदा एकादशी के वास्तविक महत्त्व और आशीर्वाद को दर्शाती है। पूरे वर्ष में मनाई जाने वाली 24 पवित्र एकादशियों में यह एकादशी विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि यह पवित्र श्रावण मास में आती है। यह शुभ दिन भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमती राधारानी की प्रेममयी लीलाओं के उत्सव, पाँच दिवसीय झूलन यात्रा (झूला उत्सव) के औपचारिक आरंभ का भी प्रतीक है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी, जिसे पवित्रोपना एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, पवित्र श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। पुत्रदा शब्द का अर्थ है “पुत्र प्रदान करने वाली”, लेकिन पुराण बताते हैं कि इस पवित्र दिन अर्जित होने वाला पुण्य केवल संतान या वंशवृद्धि तक ही सीमित नहीं है। यह कर्म बंधनों से मुक्त करता है, जीवन के कठिन समय में शांति पुनः स्थापित करता है और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भगवान विष्णु की कृपा को आमंत्रित करता है।
प्रमुख बातें :
- श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
- पुत्रदा एकादशी की कथा हमें क्या सिखाती है?
- पुत्रदा एकादशी व्रत के लिए शुभ मुहूर्त
- झूलन यात्रा : दिव्य प्रेम का उत्सव
श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
( राजा महिजित एवं प्रजा जन ऋषि लोमश के आश्रम में )
पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में श्रावण एकादशी से जुड़ी प्राचीन कथा का वर्णन मिलता है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को सुनाया था। उन्होंने बताया कि द्वापर युग में महिष्मती नाम की सुंदर नगरी पर महिजित नामक राजा का शासन था। वे न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासक थे। प्रजा उनसे प्रेम करती थी, दुष्ट लोग उनसे भयभीत रहते थे। ऋषि-मुनि भी उनका सम्मान करते थे। फिर भी, अपने समस्त वैभव और सामर्थ्य के उपरांत, राजा भीतर से दुखी रहते थे, क्योंकि उनके कोई संतान नहीं थी।
समय के साथ संतान प्राप्ति की उनकी इच्छा और भी प्रबल होती गई और धीरे-धीरे गहरे दुःख में बदल गई। एक दिन राजसभा में अपने मंत्रियों और प्रजाजनों के बीच बैठे हुए उन्होंने कहा, “मैंने इस जीवन में कभी कोई बुरा कर्म नहीं किया, कभी किसी दूसरे का धन नहीं छीना, कभी किसी के साथ विश्वासघात नहीं किया, सदैव सज्जनों की रक्षा की और दुष्टों को दंड दिया। फिर भी मुझे संतान के सुख से वंचित क्यों रखा गया है, जबकि मैंने जीवनभर धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास किया है?”
अपने राजा के दुःख से व्यथित होकर, उनके निष्ठावान मंत्री, ब्राह्मण और प्रजाजन दिव्य ऋषियों से उत्तर पाने के लिए घने वनों की ओर निकल पड़े। कई आश्रमों में जाने के बाद उन्हें ऋषि लोमश के दर्शन हुए। वे बड़े तपस्वी थे और शास्त्रों के अनुसार, वे कई युगों (कल्पों) तक जीवित रहे। कहा जाता है कि उनके शरीर से एक रोम भी तभी गिरता था, जब एक पूरा कल्प बीत जाता था। ऋषि ने उनका स्नेहपूर्वक स्वागत किया और उनकी व्यथा सुनी। गहन ध्यान में अपनी आँखें बंद करके ऋषि ने बताया कि पिछले जन्म में वे राजा एक गरीब व्यापारी थे।
“एक दिन यात्रा करते समय राजा को बहुत प्यास लगी और वे पानी पीने के लिए एक सरोवर के पास पहुँचे। तभी वहाँ एक गाय अपने बछड़े के साथ आई। वह भी प्यासी थी और पहले पानी पीने लगी। लेकिन राजा (जो गरीब व्यापरी थे) ने प्रतीक्षा नहीं की। उन्होंने गाय को एक ओर हटा दिया और स्वयं पानी पी लिया। यही एक अपराध उनके इस जन्म में संतानहीन होने का कारण बना। आज राजा के रूप में उन्हें जो सुख और वैभव प्राप्त हो रहा है, वह उनके किसी अन्य जन्म के सत्कर्म का फल है।”
राजा के पूर्व जन्म का यह प्रसंग जानकर प्रजा चिंतित हो उठी। उन्होंने ऋषि लोमश से इसका उपाय पूछा। तब ऋषि लोमश ने राजा और प्रजाजनों से श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का व्रत रखने को कहा। उन्होंने बताया कि जो भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे संतान की प्राप्ति होती है।
प्रजाजनों ने ऋषि को धन्यवाद दिया और वापस लौटकर पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति के साथ एकादशी का व्रत रखा। इसके बाद उन्होंने इस पवित्र व्रत से प्राप्त पुण्य राजा को समर्पित कर दिया। कुछ ही समय बाद रानी ने एक स्वस्थ और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
तभी से लोग इस दिन हर वर्ष श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत रखते हैं। जो लोग श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत का पालन करते हैं, वे अपने दुष्कर्मों से मुक्त होते हैं और संतान के माध्यम से सुख एवं आनंद का अनुभव करते हैं।
इस दिन श्रीहरि को मधुर पकवान और सीताफल का भोग अर्पित किया जाता है तथा जरूरतमंदों को पादुका (जूते-चप्पल) का दान किया जाता है। पुत्रदा एकादशी के इस पावन अवसर पर आप भी जगत के पालनहार श्रीकृष्ण का साधना ऐप पर 10 मिनट का मध्यम यज्ञ कर उनकी कृपा और संरक्षण को जीवन में आमंत्रित कर सकते है।
पुत्रदा एकादशी की कथा हमें क्या सिखाती है?
पद्म पुराण इस कथा के माध्यम से हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। जब हम कोई अनुचित कर्म करते हैं, तो प्रायः हमें यह बोध नहीं होता कि इस कृत्य से किस प्रकार का फल उत्पन्न हो रहा है। शास्त्र हमें स्मरण कराते हैं कि छोटी-सी भूल भी आगे चलकर बड़े दुःख का कारण बन सकती है।
इसीलिए अपने दैनिक जीवन में किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के प्रति सजग और सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। अनुचित कर्मों का प्रभाव अनेक जन्मों तक बना रह सकता है। अंततः सत्यनिष्ठ जीवन जीना, अटल श्रद्धा बनाए रखना और यह स्मरण रखना कि किसी अन्य व्यक्ति के मन को दुःख पहुँचाना बड़ी भूलों में से एक है, ये सभी हमें सदैव धर्म और उचित मार्ग पर बनाए रखते हैं।
पुत्रदा एकादशी के व्रत के लिए शुभ समय
श्रावण पुत्रदा एकादशी 2026 के मुहूर्त एवं समय इस प्रकार हैं:
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 23 अगस्त 2026 को प्रातः 02:00 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 24 अगस्त 2026 को प्रातः 04:18 बजे
- विशेष मुहूर्त: 23 अगस्त 2026 को प्रातः 09:09 बजे से 10:46 बजे तक
- पारण का समय: 24 अगस्त 2026 को सूर्योदय के बाद, लगभग दोपहर 01:41 बजे से 04:16 बजे तक
झूलन यात्रा : दिव्य प्रेम का उत्सव
( यमुना तट पर श्रीकृष्ण और श्रीराधारानी का दिव्य झूलन उत्सव )
भगवान शिव को समर्पित पवित्र श्रावण मास में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमती राधारानी के दिव्य प्रेम का उत्सव मनाया जाता है, जिससे यह एकादशी भक्तों के लिए और भी विशेष बन जाती है। यह उत्सव सनातन धर्मग्रंथों में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्मरण है। श्रीमद्भागवतम्, जयदेव रचित गीत गोविन्द और वेदव्यास रचित हरिवंश जैसे ग्रंथों में उनकी लीलाओं का सुंदर वर्णन मिलता है।
शास्त्रों के अनुसार, श्रावण मास की वर्षा ऋतु में राधारानी की सखियाँ यमुना नदी के किनारे स्थित एक विशाल कदम्ब वृक्ष पर झूला डालती थीं। ये झूला अत्यंत सुंदर ढंग से सजाया जाता था। वे प्रेमपूर्वक श्रीमती राधारानी और भगवान श्रीकृष्ण को एक साथ झूले पर विराजमान करती थीं। बारी-बारी से सखियाँ झूले को धीरे-धीरे झुलातीं, वर्षा ऋतु के मधुर गीत गातीं और उन्हें ताजे फलों तथा स्वादिष्ट पकवानों का भोग अर्पित करती थीं।
भक्तों के लिए यह उत्सव सेवा और समर्पण का प्रतीक है। आज मंदिरों में सजे हुए झूले की रस्सी खींचकर, सख्य भाव से भक्त अनुभव करते हैं कि वे स्वयं श्रीमती राधारानी और भगवान श्रीकृष्ण की सेवा कर रहे हैं। झूलन यात्रा भगवान के साथ एक अत्यंत मधुर, व्यक्तिगत और आनंदमय संबंध को दर्शाती है। यह उत्सव वर्षा ऋतु में प्रकृति के नवजीवन का भी प्रतीक है, हरी-भरी धरती, शीतल वर्षा और भगवान की आनंदमयी लीला का उत्सव।
झूलन उत्सव, 2026
- झूलन उत्सव आरम्भ तिथि - रविवार 23 अगस्त, 2026
- झूलन उत्सव समाप्ति तिथि - शुक्रवार 28 अगस्त, 2026 (श्रावण पूर्णिमा)
जिस प्रकार पवित्र श्रावण मास धरती पर वर्षा की फुहारें लाता है, उसी प्रकार श्रावण पुत्रदा एकादशी हमारे जीवन में ईश्वर का अनन्य आशीर्वाद लेकर आती है। यह पवित्र दिन केवल एक प्राचीन परंपरा नहीं, बल्कि हमें यह स्मरण कराता है कि सच्ची श्रद्धा, प्रार्थना और निःस्वार्थ भक्ति कठिन से कठिन बाधाओं को भी दूर कर सकती है। इस शुभ अवसर पर, जब श्रीमती राधारानी और भगवान श्रीकृष्ण शाश्वत आनंद में झूला झूलते हैं, आइए हम अपने मन और प्रार्थनाओं को श्रीहरि के चरणों में समर्पित करें। भगवान विष्णु आपकी सभी धर्मसम्मत मनोकामनाएँ पूर्ण करें, सभी अदृश्य बाधाओं को दूर करें और आपके परिवार को सुख, स्वास्थ्य एवं समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें।
