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कजरी तीज 2026 : तिथि, शुभ मुहूर्त, व्रत कथा, और धार्मिक महत्व

कजरी तीज 2026 : तिथि, शुभ मुहूर्त, व्रत कथा, और धार्मिक महत्व

राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, बुंदेलखंड और मारवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में कजरी तीज का विशेष स्थान है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर महिलाएँ इस पावन पर्व को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाती हैं। यह पर्व भक्ति, प्रेम और दांपत्य सुख के साथ वर्षा ऋतु की उमंग और विरह की भावनाओं को भी अपने भीतर समेटे हुए है।

कजरी तीज पर गाए जाने वाले लोकगीतों में घने काले बादल, प्रियतम से विरह और मिलन की चाह जैसी भावनाएँ व्यक्त की जाती हैं। इस दिन नीमड़ी माता की पूजा की जाती है। यह पर्व भगवान शिव और देवी पार्वती के दांपत्य प्रेम को समर्पित है। विवाहित महिलाएँ अपने पति और परिवार के सुख-कल्याण की कामना से यह व्रत रखती हैं। वहीं, अविवाहित महिलाएँ मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करती हैं।

कजरी तीज से जुड़ी पौराणिक कथाओं, तिथि और शुभ मुहूर्त के बारे में विस्तार से जानने के लिए आगे पढ़ें।

प्रमुख बातें

कजरी तीज क्या है?

हिंदू परंपरा में पूरे वर्ष कई ऐसे पर्व मनाए जाते हैं, जो तृतीया तिथि को पड़ते हैं। इनमें अखा तीज (अक्षय तृतीया) और गणगौर जैसे पर्व शामिल हैं। वर्षा ऋतु में मनाए जाने वाले प्रमुख तीज पर्वों में हरियाली तीज (छोटी तीज), हरतालिका तीज और कजरी तीज शामिल हैं। ये तीनों पर्व श्रावण और भाद्रपद मास, यानी अगस्त-सितंबर के दौरान मनाए जाते हैं।

कजरी तीज को बड़ी तीज भी कहते हैं। यह वर्षा ऋतु के भाद्रपद मास में मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व रक्षाबंधन के ठीक तीन दिन बाद और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से पाँच दिन पहले आता है। यह पावन समय ईश्वर की भक्ति, वर्षा ऋतु के लोकगीतों और दांपत्य सुख की कामना को समर्पित माना जाता है।

कजरी तीज को सतौड़ी तीज या सात्तुड़ी तीज भी कहते हैं, क्योंकि इसमें पूजा, भोग और पारंपरिक भोजन में सत्तू का विशेष महत्व होता है।

कजरी तीज की पौराणिक कथा क्या है?

प्राचीन समय की बात है। एक गाँव में एक निर्धन ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। निर्धनता के कारण वे कई बार अपने घर में दो वक्त के भोजन का भी प्रबंध नहीं कर पाते थे।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में जब कजरी तीज का पावन पर्व आया, तो ब्राह्मण की पत्नी ने पूरी श्रद्धा के साथ इस पवित्र व्रत को रखने का संकल्प लिया। वह व्रत के नियमों और पूजा-पाठ को लेकर बहुत निष्ठावान थी। इसलिए उसने अपने पति से पूजा और भोग के लिए सत्तू लाने को कहा। सत्तू भुने हुए चने, दाल और अनाज से बनाया जाता है।

ब्राह्मण स्वयं को असहाय महसूस करने लगा। वह सोचने लगा कि जब घर में न पैसे हैं और न ही भोजन, तो वह सत्तू का प्रबंध कैसे करेगा। लेकिन अपनी पत्नी की अटूट श्रद्धा और व्रत रखने के दृढ़ संकल्प को देखकर उसने कोई उपाय खोजने का निश्चय किया।

वह रात्रि में घर से निकल पड़ा। अपनी विवशता के कारण वह चुपचाप एक धनी व्यापारी की दुकान में प्रवेश कर गया। उसका उद्देश्य धन या संपत्ति चुराना नहीं था। उसने केवल पूजा के लिए आवश्यक सामग्री ही ली, जिसमें चने का आटा, घी और चीनी शामिल थे।

उसने परंपरा के अनुसार सवा किलो सामग्री ली, जो भोग के लिए आवश्यक मानी जाती थी। उसने अपनी पत्नी के लिए सत्तू तैयार किया।

जैसे ही ब्राह्मण वहाँ से निकलने लगा, दुकान में हुई हल्की-सी आहट से सेवकों की नींद खुल गई। उन्होंने उसे पकड़ लिया और शोर मचाया। वे उस पर चोरी का आरोप लगाने लगे। कुछ ही देर में व्यापारी भी वहाँ पहुँचा और ब्राह्मण से पूछताछ करने लगा।

ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर और आँखों में आँसू लिए विनती की, “मैं आपका धन चुराने नहीं आया था। आज मेरी पत्नी कजरी तीज का व्रत रख रही है, लेकिन घर में पूजा के भोग के लिए कुछ भी नहीं है। मैंने केवल थोड़ा-सा सत्तू लिया है, ताकि उसका पवित्र व्रत अधूरा न रह जाए।”

व्यापारी ने ब्राह्मण की तलाशी ली। उसके पास सत्तू की उस थोड़ी-सी मात्रा के अलावा कुछ भी नहीं मिला। ब्राह्मण की सच्चाई और उसकी पत्नी की अटूट श्रद्धा ने व्यापारी के हृदय को छू लिया। उसने ब्राह्मण को दंड देने के बजाय उसकी पत्नी को अपनी धर्म बहन मान लिया।

व्यापारी ने ब्राह्मण को पूरे सम्मान के साथ घर भेजा। उसने सत्तू के साथ नए वस्त्र, आभूषण, धन, मेहंदी, चूड़ियाँ और कजरी तीज का उत्सव मनाने के लिए आवश्यक सभी सामग्री भी दी।

(कजरी तीज व्रत का पालन करती ब्राह्मण की पत्नी)

ब्राह्मण की पत्नी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। जब वह घर लौटा, तो पत्नी ने प्रसन्नतापूर्वक तीज माता की पूजा की और प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत खोला।

पत्नी की अटूट श्रद्धा और पति की सच्चाई से प्रसन्न होकर तीज माता ने उस परिवार पर अपनी कृपा बरसाई। उनकी निर्धनता हमेशा के लिए दूर हो गई और उनका जीवन सुख, समृद्धि और खुशियों से भर गया।

आज भी कजरी तीज के अवसर पर भक्त इस पवित्र कथा का श्रवण करते हैं और अपनी प्रार्थना के अंत में यही कामना करते हैं, “जिस प्रकार तीज माता ने निर्धन ब्राह्मण के परिवार पर अपनी कृपा बरसाई, उसी प्रकार हर भक्त को भी उनका आशीर्वाद मिले। सभी को उत्तम स्वास्थ्य, सुखी दांपत्य जीवन और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त हो।”

नीमड़ी माता से जुड़ी कजरी तीज की पौराणिक कथा

राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में कजरी तीज के अवसर पर नीमड़ी माता की पूजा की जाती है। महिलाएँ नीम की डाली को नीमड़ी माता का प्रतीक मानकर उनकी आराधना करती है।  नीमड़ी माता से जुड़ी यह कथा एक धनवान, लेकिन निःसंतान व्यापारी और उसकी पत्नी की है।

एक व्यापारी की पत्नी ने संतान प्राप्ति की कामना से नीमड़ी माता से प्रार्थना की। उसने संकल्प लिया कि यदि उसे संतान की प्राप्ति हुई, तो वह कृतज्ञता के रूप में सवा मन, यानी पचास किलो सत्तू का भोग लगाएगी।

नीमड़ी माता की कृपा से व्यापारी की पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। लेकिन वह अपना संकल्प भूल गई और सत्तू का भोग नहीं चढ़ाया। समय बीतता गया और माता की कृपा से उसे कुल सात पुत्रों की प्राप्ति हुई। कुछ समय बाद उसके सबसे बड़े पुत्र का विवाह भी हो गया।

कई वर्ष बाद जब उसकी बड़ी बहू गर्भवती हुई, तो सास ने फिर नीमड़ी माता से संकल्प लिया कि संतान के जन्म के बाद वह सवा छह किलो सत्तू का भोग लगाएगी। कुछ समय बाद बहू ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन अगले वर्ष कजरी तीज का पर्व आया, तब भी सास ने अपना संकल्प पूरा नहीं किया। उसने सोचा कि जब उसके पोते का विवाह होगा, तब वह नीमड़ी माता को पचास किलो सत्तू का भोग लगाएगी।

समय बीतता गया। पोता बड़ा हुआ और उसका विवाह भी हो गया। कजरी तीज का पर्व आया तो सास, उसकी बहू और पोते की नवविवाहिता पत्नी तीनों साथ मिलकर नीमड़ी माता की पूजा करने गईं। 

लेकिन जैसे ही वे पूजा करने के लिए आगे बढ़तीं, नीमड़ी माता का विग्रह उनसे दूर होता जाता। यह देखकर वहाँ उपस्थित अन्य महिलाओं ने पूछा, “क्या आपने देवी से कोई ऐसा संकल्प लिया था, जिसे पूरा नहीं किया?”

यह सुनते ही सास को अपने पुराने संकल्प याद आ गए। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने अपनी गलती स्वीकार की और नीमड़ी माता से क्षमा माँगी।

घर लौटने के बाद सास ने पूरी श्रद्धा के साथ कजरी तीज की पूजा की और नीमड़ी माता को संकल्प के अनुसार सत्तू का पूरा भोग अर्पित किया। उसकी सच्ची पश्चात्ताप भावना से प्रसन्न होकर देवी ने उस परिवार पर अपनी कृपा बरसाई। उनका घर धन-धान्य से भर गया और परिवार के सभी सदस्यों को दीर्घायु, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

नीमड़ी माता की यह कथा सिखाती है कि श्रद्धा से किए गए संकल्प को सदैव याद रखना चाहिए और उसे पूरी निष्ठा के साथ पूरा करना चाहिए। लालच या लापरवाही के कारण अपने वचन को भूलने से जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, जबकि सच्चा पश्चात्ताप और अटूट श्रद्धा व्यक्ति को फिर से देवी की कृपा और समृद्धि का पात्र बना देती है।

कजरी तीज व्रत 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त

कजरी तीज का व्रत पूरे दिन रखा जाता है और चंद्रोदय के बाद व्रत खोला जाता है। उदय तिथि के नियम के अनुसार, वर्ष 2026 में कजरी तीज का व्रत 31 अगस्त 2026 को रखा जाएगा।

तृतीया तिथि प्रारंभ : 30 अगस्त 2026 को सुबह 09:36 बजे
तृतीया तिथि समाप्त : 31 अगस्त 2026 को सुबह 08:50 बजे

2026 में कजरी तीज की पूजा के शुभ मुहूर्त

  • ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 04:26 बजे से 05:11 बजे तक
  • अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:42 बजे तक
  • संध्या या सायंकालीन पूजा मुहूर्त : शाम 06:37 बजे से 07:45 बजे तक

कजरी तीज अपने पारंपरिक कजरी लोकगीतों के माध्यम से भक्ति की एक अनूठी स्थानीय परंपरा को संजोए हुए है। बदलते समय के बीच भी ये मधुर लोकधुनें और सामुदायिक परंपराएँ आशा, विरह और जीवन के प्रति अटूट विश्वास जैसी भावनाओं को आज भी जीवंत रखती हैं। तीज माता की कृपा आपके घर को शांति, प्रेम और असीम समृद्धि से भर दे। 

कजरी तीज की हार्दिक शुभकामनाएँ!