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गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी, 2026

गणेश चतुर्थी 2026 की तिथि, पूजा मुहूर्त, अनंत चतुर्दशी और पर्व का महत्व।

गणेश चतुर्थी, 2026

गणेश चतुर्थी, 2026

 

गणेश पुराण के द्वितीय खंड, अध्याय 5 में वर्णित है कि जब श्री गणेश को हाथी का मस्तक प्रदान किया गया, तब महादेव ने घोषणा की कि उनका जन्म भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (चौथी तिथि) को हुआ है। इसलिए भक्त हर वर्ष इस दिन का उत्सव मनाएँगे, जिससे उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।

जब हम अपने घरों में बुद्धि के स्वामी भगवान गणेश के स्वागत की तैयारी करते हैं, तो इस पर्व से जुड़े कई सवाल मन में आते हैं। आइए, जानते हैं गणेश चतुर्थी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब।

मुख्य बातें :

गणेश चतुर्थी 2026 कब मनाई जाएगी?

गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।

चतुर्थी तिथि प्रारंभ — 13 सितंबर 2026 को रात 09:36 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त — 14 सितंबर 2026 को रात 10:14 बजे

मूर्ति स्थापना और मुख्य पूजा के लिए मध्याह्न का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। पारंपरिक रूप से मान्यता है कि यही भगवान श्री गणेश के प्राकट्य का समय है।

मध्याह्न गणेश पूजा मुहूर्त — सोमवार, 14 सितंबर 2026 को सुबह 11:48 बजे से दोपहर 02:18 बजे तक
अवधि — 02 घंटे 30 मिनट

विघ्नहर्ता के साथ अपने संबंध को और गहरा करने के लिए आप साधना ऐप पर आयोजित तीन दिवसीय उच्छिष्ट गणपति साधना में सम्मिलित हो सकते हैं। साधना का आरंभ गणेश चतुर्थी के पावन दिवस 14 सितंबर से होगा और 16 सितंबर 2026 को इसका समापन होगा। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें।

गणेश चतुर्थी कितने दिनों तक मनाई जाती है?

यह उत्सव भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। हालाँकि, अलग-अलग परिवार और समुदाय अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार अलग-अलग अवधि के लिए यह उत्सव मनाते हैं। परिवार की परंपरा और सुविधा के अनुसार लोग प्रायः मूर्ति को डेढ़ दिन 3, 5, 7, 9 या 11 दिनों तक घर में स्थापित करते हैं।

अनंत चतुर्दशी क्या है और इस दिन क्या होता है?

अनंत चतुर्दशी, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि (चौदहवाँ दिन) है। यह 10 दिवसीय गणेश चतुर्थी उत्सव का अंतिम दिन होता है, जो भगवान गणेश को विदा करने के लिए समर्पित है। इस दिन भगवान गणेश की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है।

उत्तरपूजा, अर्थात अंतिम पूजा, विशेष आरती के साथ की जाती है। इसमें भक्त भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, मोदक अर्पित करते हैं और पूजा के दौरान हुई किसी भी अनजाने भूल के लिए क्षमा माँगते हैं। इसके बाद भक्त “गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या” (“हे भगवान गणेश, अगले वर्ष जल्दी वापस आइए”) का जयघोष करते हुए मूर्ति को शोभायात्रा में नदी, तालाब, समुद्र या निर्धारित कृत्रिम जलकुंड तक ले जाते हैं और उसका विसर्जन करते हैं।

विसर्जन इस आध्यात्मिक सत्य का प्रतीक है कि जिस प्रकार मिट्टी जल में घुलकर प्रकृति में विलीन हो जाती है, उसी प्रकार प्रकृति से उत्पन्न हर वस्तु अंततः प्रकृति में ही लौट जाती है।

गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी में क्या अंतर है?

संकष्टी चतुर्थी और गणेश चतुर्थी, दोनों ही श्री गणेश को समर्पित पवित्र व्रत और धार्मिक अवसर हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा, महत्त्व और पूजा-विधि में काफी अंतर है।

संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आती है। इस दिन भक्त श्री गणेश की पूजा-अर्चना करते हैं। “संकष्टी” का अर्थ है संकटों और कष्टों से मुक्ति, इसलिए यह दिन जीवन की बाधाओं, कठिनाइयों और आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिए श्री गणेश से प्रार्थना करने के लिए विशेष माना जाता है।

इसके विपरीत, गणेश चतुर्थी वर्ष में एक बार मनाई जाती है।

अंगारकी चतुर्थी क्या है?

अंगारकी चतुर्थी, जिसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है, अत्यंत शुभ मानी जाती है। यह तब आती है जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है। अंगारकी शब्द अंगारक से बना है, जिसका संस्कृत में अर्थ “दहकते हुए अंगारे के समान लाल” है। यह मंगल ग्रह को संदर्भित करता है और मंगलवार पर मंगल ग्रह का अधिपत्य माना जाता है।

परंपरा के अनुसार, अंगारकी चतुर्थी के दिन व्रत रखने और पूजा करने से पूरे वर्ष की सभी चतुर्थियों का व्रत रखने के समान आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।

हिंदू परंपरा में चतुर्थी तिथि से जुड़े कुछ अन्य प्रमुख व्रत और पर्व हैं:

  • बहुला चतुर्थी, जिसे बोल चौथ भी कहा जाता है, भाद्रपद मास में मनाई जाती है। इस दिन भक्त गौवंश की पूजा करते हैं और परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।
  • करक चतुर्थी, जिसे करवा चौथ भी कहा जाता है, कार्तिक मास में मनाई जाती है। सकट चौथ, जिसे माही चौथ या तिलकुटा चतुर्थी भी कहा जाता है, माताएँ अपनी संतान के कल्याण और सुख-समृद्धि के लिए मनाती हैं।

चतुर्थी तिथि पर चंद्रमा को देखने से क्यों बचने की सलाह दी जाती है?

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, चतुर्थी तिथि, विशेषकर गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने से मिथ्या दोष लगता है। इसे झूठे आरोप या अपमान का दोष माना जाता है। भगवान गणेश और चंद्रदेव से जुड़ी एक कथा के कारण इस दिन चंद्रमा को देखने से बचने की परंपरा है।

एक बार श्री गणेश भव्य भोज के बाद मोदक का आनंद लेकर अपने घर लौट रहे थे। रास्ते में वे ठोकर खाकर गिर पड़े और उनके मोदक बिखर गए। अपने रूप और तेज पर गर्व करने वाले चंद्रदेव ने यह दृश्य देखा और हँसने लगे। चंद्रमा के अहंकार और संवेदनहीनता से अपमानित होकर श्री गणेश ने उन्हें श्राप दिया कि जो भी व्यक्ति चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखेगा, उसे झूठे आरोप, अपमान या सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ेगा।

बाद में चंद्रदेव ने क्षमा माँगी, जिसके बाद श्राप को कुछ शिथिल किया गया और चंद्रमा को समय के साथ फिर से पूर्ण प्रकाश प्राप्त करने की अनुमति मिली। हालाँकि, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने से बचने की परंपरा बनी रही।

यदि कोई व्यक्ति भूलवश इस रात चंद्रमा को देख ले, तो श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध, अध्याय 56 में वर्णित स्यमंतक मणि की कथा का पाठ या श्रवण करने की शास्त्रीय परंपरा बताई गई है। इस कथा में श्री कृष्ण ने अनजाने में चंद्रमा को देखने के बाद अपने ऊपर लगे झूठे आरोप को दूर किया था। ऐसा मिथ्या दोष के प्रभाव को दूर करने के लिए किया जाता है।

विघ्नों को दूर करने वाले और नवीन शुरुआत के अधिष्ठाता श्री गणेश हमें सिखाते हैं कि श्रद्धा और विवेक से हर कठिनाई का सामना किया जा सकता है।

आइए इस वर्ष हम केवल मूर्ति का विसर्जन न करें, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, आलस्य और नकारात्मकता का भी विसर्जन करें, और गणपति के गुणों विवेक, धैर्य और करुणा को अपने जीवन में धारण करें।

मिट्टी की प्रतिमा जल में विलीन होकर हमें सिखाती है कि रूप अस्थायी है, पर भाव शाश्वत। यही भाव श्रद्धा, सेवा और शुद्ध हृदय की प्रार्थना हमें वर्षभर गणपति के साथ जोड़े रखता है।

विघ्नहर्ता श्री गणेश हमारे जीवन के हर मार्ग से बाधाएँ दूर करें, आपके संकल्पों को सिद्धि प्रदान करें, और आपके घर-परिवार में सुख, समृद्धि तथा आध्यात्मिक प्रकाश का सदा वास रहे।

गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या!